य़ह एक टॉर्च है
इससे ख्वाब नहीं देखे जाते ,
हाँ
टूटे ख्वाबों के टुकड़े
बिखड़े पड़े होते हैं जो
दिन के उजालों में ,
चुभते हैं जो
बदन के अन्दर छुपे
मुरझाये हुए
अहसासों को ,
या
जो खटकते हैं
पुरानी तस्वीरों के
चटखते रंगों में
नागवार धब्बे की तरह,
उन्हें देखना
इस टॉर्च के उजालों के बाहर
फैले गहन अन्धकार में
जो इंसान की
ख्वाबीदा हक़ीक़तों को
मुँह चिढाते हैं
-19सेप2009
Monday, September 21, 2009
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